“77 मंत्रियों की संपत्ति की सूची जारी कर पहली बार मंत्रियों की संपत्ति के बारे मे जानकारी सार्वजनिक की है।”- अरे! जो बच्चे बच्चे को पता है, उसे क्या सर्वजनिक करने का दावा! और इसमें स्विट्जरलैंड –फ़ेक्टर कहाँ है जनाब?
पैसा लूटने के सिवा, नेता का क्या काम?
लूटो-लुटाओ-लूट की जाँच का बनता काम.
जाँच का बनता काम, बिठा दी जाँच-कमेटी.
उसमें भी पैसे का चक्कर, लूटा-लूटी.
कह साधक कवि, स्वागत है आ जाओ लूटने.
फ़ुर्सत कहाँ है इसे, लगा है पैसा लूटने.
नितिन गडकरी ने फोन पर ही आदेश पारित कर दिया कि हर हाल में झारखण्ड में सरकार बननी चाहिए. हालांकि ऊपरी तौर पर भले ही यह लग रहा हो कि नितिन गडकरी संघ की इच्छाओं का सम्मान कर रहे हैं लेकिन हकीकत यह है िक झारखण्ड में किसी भी सूरत में कोई सरकार बनवाने के लिए औद्योगिक घराने सक्रिय हैं. इस बार आश्चर्यजनक रूप से रिलायंस समूह का अनिल अंबानी धड़ा भी राज्य में भाजपा की सरकार बनवाने की कोशिशों में लगा हुआ था.
कितने दिन चल पायेगी, यही प्रश्न है मुख्य.
मुंडा जी के सामने, विकट प्रश्न है मुख्य.
विकट प्रश्न यह मुख्य, भाजपा सत्ता-लोभी.
काँग्रेस की राह चल रही जोर से वो भी.
कह साधक कवि, यह फ़ंडा चलना कितने दिन?
प्रश्न यही है मुख्य कि मुण्डा है कितने दिन?
हिन्दी-ब्लोग्स पर एक पत्रकार-सेमिनार देखा. मुख्य चिन्ता यही थी कि सब बिकाऊ हैं, पत्रकारिता पूरा व्यापार बन गई है.
“नीलम महाजन सिंह ने कहा कि यह कारपोरेट घरानों द्वारा फैलाया गया एक कुचक्र है जिसमें यह कहा जाता है
कि पत्रकारों के पास पैसा नहीं होना चाहिए और उन्हें त्याग भावना से काम करना चाहिए. नीलम महाजन सिंह का कहना है कि पत्रकारों के पास खूब पैसा होना चाहिए ताकि वे जैसे चाहें वैसे काम कर सकें. अगर ऐसा होता है तो अखबार मालिक भी पत्रकारों के ऊपर मनमानी नहीं कर सकेंगे. नीलम महाजन सिंह ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि पत्रकारिता में लड़कियों की स्थिति आज भी बहुत अच्छी नहीं है. प्रथम प्रवक्ता के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा कि पूरी पत्रकारिता को टीले पर खड़ा नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता भी समाज का हिस्सा होती है इसलिए समाज में जो बुराइयां दिख रही हैं वे पत्रकारिता में भी दिखाई पड़ रही है. श्री राय ने कहा कि आज देश के अखबारों में संपादक प्रतिष्ठान ध्वस्त हो गया है जिसके कारण अखबार मालिक पत्रकारिता को भी निर्देशित करने लगे हैं. अगर संपादक प्रतिष्ठान स्थापित हो जाए तो बहुत हद तक परिस्थितियां बदल जाएंगी.” - अब कोई पूछे राय साहब से कि सम्पादक क्या सीधे “बहादुर राम” प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे, जो पैसे के महत्व को नकार कर सीधे ’देवता’ बन जायेंगे? बङी बात यह कि,
आज प्रकाशक बन गये, सम्पादक जी देख.
पैसा सिर चढ बोलता, आँख खोलकर देख.
आँख खोलकर देख, भले ही आँख मूँदकर.
पैसा-पैसा गूँज रहा है, सबके भीतर.
कह साधक कवि, पैसा सब पापों का कारक.
लेखक-सम्पादक बनते हैं आज प्रकाशक.
बिहार चुनावों की चर्चा में ’मोदी-मोदी’ खेल चल रहा है. अयोध्या पर ’फ़ैसला’ और मोदी की तेज धार ’माहौल’ बदल सकती है. नेताओं का भी मानना है कि फैसला आने के बाद माहौल बदल ही जाएगा। चूंकि उस समय बिहार के विधानसभा चुनाव रहेंगे तो सबसे ज्यादा असर उसी पर पड़ेगा इसलिए अब नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार के लिए ले जाने का कोई खास मतलब नहीं है।
गौर से देखो पिट रहे, राजनीति में राम.
हर चुनाव के वक्त क्यों, जग जाते हैं ’राम’?
जग जाते जो ’राम’, भला होता दुनियाँ का.
नित्य हो रहा आज कबाङा इस दुनियाँ का.
कह साधक कवि, भीतर-बाहर गौर से देखो.
राजनीति में राम पिट रहे गौर से देखो.
नासमझी में हो रहा, मोदी नाम का ब्राण्ड .
वरना नीतिश कम कहाँ, हैं बिहार के साँण्ड.
हैं बिहार के साँण्ड, एक मोदी भी पाला.
नरेन्द्र से डरते, सुशील क्या लगता साला?
कह साधक कवि, सब चलता है राजनीति में.
ब्राण्ड बन रहे मोदी, केवल नासमझी में.
