यहां पर -5

sadhak

सहिष्णुता भरपूर देख लो

असहमति का है सत्कार।

दो विपरीत ध्रुवों में दिखती

पूरकता हरबार यहां पर॥1।

 

पति-पत्नी के शाश्वत झगङे

नारी-पुरुष का आकर्षण है।

उत्तर-दक्षिण ध्रुवों के जैसा

पूरकता का भाव यहां पर।2॥

 

है प्रतिपक्ष, विरोध कहां है,

नैसर्गिक नियमों की बात।

सही समझ सुलझा देती है

सभी प्रश्न हल हुए यहां पर।3॥

 

दिन रोशन रातें अंधियारी

हर श्रम को विश्राम मिला।

रचना संग विरचना का क्रम

सृष्टि का श्रृंगार यहां पर।4॥

 

आकर्षण विपरीत ध्रुओं का

सृष्टि-चक्र बनाए रखता

इलेक्ट्रोन-प्रोटोन मिले तो

प्रलय त्वरित हो जाए यहांपर।5॥

 

सर्वोत्तम रचना सृष्टि की

मानव पर है जिम्मेदारी।

धरा बचे, सम्पन्न रहे

हो स्वर्गधाम सर्वदा यहांपर।6॥

 

सुख भावों में वर्तमान है

सुविधामय प्रकृति की रचना।

आत्मा और देह का भोजन

वर्तमान पर्याप्त यहां पर।7॥

 

सकल पदारथ है जग माहीं

करकहीन जन पावत नाहीं।

बाबा तुलसी बोल रहे हैं

शाश्वत वाणी आज यहांपर।8॥

 

कर्म-धर्म का मर्म जान लो

जीवन का विज्ञान समझ लो।

न्याय-सत्य आधारित जीवन

अमर सर्वदा रहे यहां पर।9॥

 

साधक की साधना यही है।

खुद को जाने जग पहचाने।

बाहर-भीतर फ़र्क नहीं है

एक तत्व विस्तार यहांपर॥10॥

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