यहां पर -6

20150917-0002

जो है सो तो कभी न दिखता

जो दिखता है सो न उपस्थित।

खेल बना पूरा मायावी

दूभर इसका बोध यहांपर।1॥

 

मानव सही का आकांक्षी है

खोलना चाहे रहस्य सारे।

उलझे धागे सुलझाने की

विधा न कोई कहे यहांपर।2॥

 

कुछ कहते आद्यात्मिकता है

अन्य बताते रहस्य गहरे।

मन्त्र सुझाते ॠषि-मुनि-ज्ञानी

समझ किसे आता है यहांपर।3॥

 

नासमझी की पीङा बढती

व्यर्थ-व्यस्तता भी दौङाती

जरा-जीर्ण हो देह की हालत

तब उठता ये विचार यहां पर।4॥

 

दुनियांदारी की उलझन है

घर-गृहस्थी की आपा-धापी।

कौन पढे और कितना समझें

खुद में सब हुशियार यहांपर।5॥

 

दूकानें अनगिनत खुली हैं

चमत्कार के अनेक किस्से।

प्रायोजित साधु-सन्यासी

ठगते पब्लिक रोज यहां पर।6॥

 

सबकी डफ़ली, राग भिन्न हैं।

विषय भिन्न, अन्दाज भिन्न हैं।

सत्संग-कथा-महफ़िलें-ध्यान की

संस्थाएं अनगिनत यहांपर।7॥

 

जितनी संस्थाएं बढती हैं

उतना ही बट जाता मानव।

टुकङे-टुकङे हुई जिन्दगी

बटोरने में चुके यहां पर।8॥

 

मानव पसरा संस्थाओं में

भुला ही बैठा हस्ती अपनी।

संस्थाएं हावी मानव पर

चलता उल्टा चक्र यहां पर।9॥

 

देख-देख यह खेल अनोखा

मौज में हंसता है यह साधक

समझे कौन किसे समझाऊँ

जन-गण-मन उलझा है यहां पर।10॥

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