उत्सवित गीत-3

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पदार्थ से दिव्य मानव तक, चेन परमाणु से जागृत चैतन्य परमाणु तक विकास क्रम है विकास है। जागृति क्रम है, जागृति है, सह अस्तित्व है। आईये सह अस्तित्व का भाष आभाष पाएं; परमाणु मे, व्यवस्था मे, नियम नियन्त्रण और सन्तुलन मे।

 

परमाणु खुद व्यवस्था, बड़े मे भागीदार।

नियम नियन्त्रण सन्तुलन, सह अस्तित्व का सार॥

रे साधक! कर अस्तित्व का मान।1॥

 

गठनपूर्ण परमाणु है, जीवन एक आकार।

निराकार मे ढूंढिए, पाओगे साकार॥

रे साधक! कोई नहीं करतार।2॥

 

घूर्णन कम्पन चक्रगति, कणकण मे  नित जान।

सहज व्यवस्थित स्वयं मे, बड़े मे नित अबदान।

रे साधक! कर अपना अबदान।3॥

 

परमाणु से अणु बना, रचना क्रम संसार।

रसायनिक भौतिक क्रिया, यौगिक कई हजार॥

रे साधक!। रचना क्रम संसार।4॥

 

गठन शील परमाणु है, गठन पूर्ण परमाणु।

प्यास पूर्णता की बढी, चेतन जड़ परमाणु॥

रे साधक! गठनपूर्ण परमाणु।5॥

 

परमाणु की पूर्णता, निश्चित चारो ओर।

व्यापक से अनुबन्ध है, सम्बन्धों की डोर॥

ले साधक! सम्बन्धों की डोर।6॥

 

अक्षय शक्ति बल भरा, गठनपूर्ण परमाणु।

भारमुक्त आशा बन्धी, यह जीवन परमाणु॥

रे साधक! तू जीवन परमाणु।7॥

 

कोशिका से बनस्पति, पत्ते पल्लव फ़ूल।

फल सङ्ग बीज पुनः मिला, थोड़े से है सूल॥

रे साधक! रहना हरदम कूल।8॥

अंशो की गिनती मे है, विकास क्रम का भेद।

भूखे और अजीर्ण मे, आकर्षण का भेद॥

रे साधक! समझ मिलन का भेद।9॥

 

एक से लेकर चार तक, चक्र व्यवस्था जान।

विकासक्रम का सन्तुलन सौ पर बाइस मान॥

रे साधक! मानवतन्त्र का ज्ञान।10॥

 

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