About

विचार के आयाम में – मैं.
हिन्दू-राष्ट्र-वादी संस्कार था. शेष समुदायों को या तो कमतर मानता था, या विरोध करता, अथवा फ़िर हिन्दुत्व के विस्तार के रूपमें स्वीकारता था.
संघर्ष से विजय-प्राप्ति लक्ष्य था, निरन्तर कर्म-प्रधान चर्या थी. राम-मन्दिर आन्दोलन हेतु जेल-यात्रा के बाद लिखना शुरु किया. लेख, कवितायें, नाटक,संस्मरण, रिपोर्ट, शोध-पत्र आदि लिखे-छपे.
गीता-उपनिषद, जैन दर्शन, बौद्ध, कुरान, बाईबिल आदि दर्शनों में जीवन के सूत्र ढूँढता था, ओशो एवं जे.कृष्णामूर्ति को काफ़ी पढा-समझा. समकालीन अधिकांश साहित्यकार, उपन्यास,नाटक,लेख,काव्य आदि पढे.संस्कृत, गुजराती,मराठी,राजस्थानी,हिन्दी,अंग्रेजी आदि भाषायें विचार को प्रभावित करती रहीं.
प्रश्न किन्तु बङे ही होते गये, जीना बोझिल हुआ.

१८ मार्च,२००९ जीवन-विद्या से परिचयके बाद-
१- मानव जाति एक- वसुधैव कुटुम्बकम.
२- संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व है. बदलाव के लिये अब तक के सभी आन्दोलनों से दूर.
३- स्व-अध्ययन. कार्य-व्यवहारमें अपनी आशा-विचार-इच्छा को जान लेता हूँ.
४- पहले का व्ज़िच्ज़्ज़्रिक संग्रह अपने-आप व्यवस्थित हो गया है. व्यर्थता और मूर्खता का स्मरण भी मुस्कान देकर लौट जाता है. लिखना अब भी जारी है.

व्यवहार के स्तर पर
अनिश्चित आचरण था, प्रायः दुखी ही करता था.
मानव-मानव में कई स्तर पर भेद कर रखे थे- देश-प्रान्त,भाषा-बोली, पहनावा-खान-पान, धर्म-जाति, सम्प्रदाय-शिक्षा, धन-पद, उम्र-लिंग, और अपनी तत्कालीन संचरणशील मनःस्थिति—इतनी भेद-रेखायें थी. इनसे प्रभावित आचरण था. इन सबके कारण आचरण की निश्चितता हो ही नहीं सकती थी. स्वयं दुखी होकर अपने परिवेशमें दुःख ही बाँटता था. शरीर थक जाता था, गुस्सा, खीज और निराशा के भीव कई बार आत्म-हत्या तक उठे. बीमारियां पा ली. पेट की अनियमितता और चर्म-रोग के कारण सामान्य दिन-चर्या में भी बाधायें थी.

१८ मार्च २००९ से लगातार स्व-अध्ययन में हूँ, पूर्व-परिचितों के साथ व्यवहार की सीमा फोन तक है, अतः समीक्षा नहीं हो सकती. परिवारी जन- पत्नी-बच्चे कभी-कभी स्वीकारते हैं कि व्यवहार संवरा है, आशंका मुक्त नहीं हुये. सोचमें बदलावका प्रभाव स्वयं में देख पाता हूँ. आनन्द काल लम्बा होता है, व्यवधान काल छोटा होने लगा है. शरीर सामान्यतः थकता नहीं. दिनचर्या स्थिर-व्यवस्थित हुई- तो विचारे हुये सारे काम होने लगे हैं. कार्य विलम्बित न होनेका सुख-संतोष-आनन्द पाता हूँ. जिन प्रसंगो में अहंकार खङा हो जाता है, उसे देख पाता हूँ- पर अब प्रायश्चित और अवसाद नहीं आता.

कार्य
संघर्ष-जन्य तोङ-फ़ोङ के कार्यसे जुङा था. आन्दोलन का भाव निरन्तर चलता था. अधिकतर परिवारसे दूर प्रवास पर रहता था, इस कारण स्वास्थ्य सदा संकट में रहता था. दिनचर्या में अनियमितता का दुष्प्रभाव कार्यों पर पङता था. सही समझा तो पाया कि कार्य-व्यवहार के स्तर पर या तो शून्य था अथवा विपरीत. सांसारिक-आर्थिक दायित्वों से कटा एक गैर-जिम्मेदार,अनिश्चित और असहनीय व्यक्ति रहा हूँ.
सह-अस्तित्व की सहमति बनी तो संघर्ष के सारे आयाम या तो शेष हो गये, या कम हो रहे हैं. प्रवास कम होते-होते अत्यल्प है. जमीन और गायके साथ श्रम शुरु हुआ. लाडनूँ के अपने पैतृक घरको अध्ययन-केन्द्र मानकर स्वयं का अध्ययन कार्य-व्यवहार-विचार में शुरु हुआ है. कार्य अब ६० वर्ष की उम्रमें शुरु कर रहा हूँ.

अनुभव.
जिन बातों को अनुभव मानता था, वे सब परम्परा, शिक्षा और अपनी गलतियों का पुलिन्दा है.
शिक्षा- विज्ञान स्नातक, कानून में फ़ेल. साहित्य,दर्शन में स्नातकोतर. शोध कार्य निष्ठा पूर्वक पूरा करके डिग्री नहीं ली. व्यवस्था (मेनेजमेंट).
ध्यान-साधना- विपश्यना के कई शिविर किये. प्रेक्षा-प्रशिक्षक रहा. योग-प्रशिक्षक. शरीर पर कई दुःसाहसिक प्रयोग किये. वनों-गुफ़ाओं के एकान्त में रहा.
सानाजिक कार्य- विद्यार्थी-कालमें स्काऊट. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक रहा. विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद,कल्याऊ आश्रम, एकल-विद्यालय,विद्या भारती, गायत्री परिवार,अणुव्रत, जीवन-विज्ञान, संस्कृत-संभाषण, प्राकृतिक-चिकित्सा आदिके कई शिविर, आन्दोलनों और कार्यक्रमों में सक्रिय रहा. साधु-सन्तों, समाज-शास्त्रियों, चिन्तकों के साथ सामूहिक और् एकान्त चर्चा-सत्रों में व्यक्ति-परिवार-समाज-राष्ट्र और वैश्विक समस्याओं पर विमर्ष किया. संस्थाओं के चाल-चरित्र को समझ कर छोङा. शरीर-मन-बुद्धि सभी स्तरों पर प्यास बढती रही, एक शापित जीवन बिता रहा था.
बची देह-यात्रा स्वयं के अध्ययन में लगानी है, अन्य कोई योजना नहीं. बदलाव की धारा-दिशा बाहर से अन्दर की ओर बनी है. सार्थक भाव से कार्य-व्यवहार में लगा हूँ.स्वयं की जिम्मेदारी है कि शापित से साधक बनूँ.
अब अनुभव को पहचाना- उसकी तरफ़ बढ रहा हूँ. आनन्दम. कृतज्ञोस्मि. – साधक उम्मेदसिंह बैद.

One thought on “About

  1. साधक जी आपने साइट बनायी बधाई हम जो चाहे यदि उसके लिए दृढ व प्रतिबद्व रहे तो कभी भी मुशिकल को हरा सकते है।इसको थोडा सजा ले ।अभी बहुत सिम्पल है………keep it up.

    sunita sharma
    freelancer journalist
    u can read my features and articles on http://www.himalayauk.org

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