sahiasha

कहानी- हमसबकी-१

In कहानी on December 24, 2009 at 9:07 am

कहानी- हमसबकी-१

मैं भोपाल में एक परिवारमें मेहमान था.

घरके मालिक बहुत वर्षों से आग्रह करते थे कि भोपाल आओ, और हमारे घर ही रहो.

घरके एक कमरे में एक आदमी को बन्द करके रखा था.

बिटिया मेरे लिये पानी लेकर आई, उसको पूछने पर पता चला कि चाचाजी पागल हैं, कुछ उल्टा-पुल्टा ना करदें, इसलिये बन्द करके रखते हैं.

थोङी देरमें उसका छोटा भाई आया. ज्यादा छोटा नहीं, कालिज में पढता है. बहन भी एक-दो साल ही बङी है.

घर आने के दो ही मिनट में भाई-बहन झगङने लगे, भाई अपनी बहन को मार भी देता है, बहन नाराज होती है, झगङ्ती है. माँ दोनों के मेरे सामने कर देती है, कि मैं उन्हें समझाऊँ. मैंने पाया कि लङका खुद ही इतना समझदार है कि मुझे समझा दे, तो मैं उसे क्या समझाता.

मैंने उससे बातचीत शुरु करने के लिये पूछ लिया कि चाचाजी को क्या हो जाता है?

“ उनका आचरण निश्चित नहीं है. भूख लगने से खाना मांगते हैं…. सब्जी-रोटी खाते-खाते अपने बदन पर मल लेते हैं, कभी फ़ेंक भी देते हैं. शायद चाची ने इनको सही प्यार नहीं दिया… ”- लङके ने बताया.

“ अच्छा, तुम तो अपनी बहन को प्यार करते हो कि नहीं ?”… मैंने पूछा.

“ बहुत प्यार करता हूँ….” उसका उत्तर था.

“ प्यार करते हो तो उसे खुश रखना चाहते हो या नाखुश?”- मेरा अगला प्रश्न था.

“ नाखुश क्यों? मैं तो उसे बहुत खुश रखना चाहता हूँ”. उसका स्पष्ट उत्तर जानकर मैंने हँसकर कहा कि फ़िर उसे मारते क्यों हो?

“ वो तो चलता है प्यारमें…” वह ऐसे बोला जैसे रोज ही बहन को ऐसे ही प्यार करता है.

“ तुम्हारी मार खाकर वह खुश होती है या नाराज होती है?”…. मेरे पूछने पर उसका सही उत्तर मिला- नाराज!

“ चाहते हो उसे खुश रखना, और करते हो रोज नाराज… तो तुम्हारे आचरण को निश्चित समझा जाये या अनिश्चत?”… इस बात पर लङका सोच में पङ गया. उत्तर मिलने की अपेक्षा भी नहीं थी, न मिला.

उत्तर मिला शामको.

शाम उसके पिताजी आफ़िस से लौटे, तो घंटी बजते ही दौङ कर लङके ने दरवाजा खोला.

“ आप मुझे प्यार करते हैं या नहीं?”- लङके ने दरवाजे पर ही पूछ लिया.

पिता हैरान! यह आज क्या हो गया ! फ़िर थोङा संभलकर बोले-“ यह क्या सवाल है?….   …. मैं तुमको प्यार करता हूँ, और बहुत प्यार करता हूँ.”

“तो मुझे खुश रखना चाहते हैं या नाराज?”

“खुश ही रखना चाहता हूँ….अब अन्दर तो आने दो.”- पिता की हैरानी बढ गई. बेटे के प्रश्न अभी बाकी हैं.

“तो फ़िर रोज मुझे आपसे डाँट क्यों सुननी पङती है?”

“ वह तो प्यार में…” पिता ने सहज होने की कोशिश की.

“मैं आपकी डाँट खाकर खुश होऊँ तो ठीक रहेगा?”

अब पिता फ़ंस गये.

“खुश तो कैसे होओगे, नाराज ही होते हो…”

“आप मुझे खुश करना चाहते हैं, और रोज नाराज कर देते हैं, तो आपका आचरण निश्चित हुआ या अनिश्चित?”- बेटे ने निष्कर्ष पर पहुँचा दिया.

इससे आगे बेटे को बोलने का मौका पिता ने नहीं दिया. खुद ही बोल पङे- “इसका मतलब कि मैं पागल हूँ….?”

“ आप खुद ही सोच लीजिये पापा!”- बोलकर बेटा चलता बना.

आधा घंटा बाद वे सज्जन मुझसे पूछ रहे थे कि मैं  वापस कब जा रहा हूँ.

भोपाल का यह परिवार बहुत सफ़ल माना जाता है. समाज में इनकी इज्जत है, इनको समझदार माना जाता है. बिल्कुल वैसे ही जैसे आपके या किसी भी सामान्य परिवार को माना जाता है.

प्रस्तोता – साधक उम्मेदसिंह बैद

श्री गणेश बगङिया

साधक-परिक्रमा

In Uncategorized on September 25, 2010 at 6:42 am

“77 मंत्रियों की संपत्ति की सूची जारी कर पहली बार मंत्रियों की संपत्ति के बारे मे जानकारी सार्वजनिक की है।”- अरे! जो बच्चे बच्चे को पता है, उसे क्या सर्वजनिक करने का दावा! और इसमें स्विट्जरलैंड –फ़ेक्टर कहाँ है जनाब?

पैसा लूटने के सिवा, नेता का क्या काम?

लूटो-लुटाओ-लूट की जाँच का बनता काम.

जाँच का बनता काम, बिठा दी जाँच-कमेटी.

उसमें भी पैसे का चक्कर, लूटा-लूटी.

कह साधक कवि, स्वागत है आ जाओ लूटने.

फ़ुर्सत कहाँ है इसे, लगा है पैसा लूटने.

नितिन गडकरी ने फोन पर ही आदेश पारित कर दिया कि हर हाल में झारखण्ड में सरकार बननी चाहिए. हालांकि ऊपरी तौर पर भले ही यह लग रहा हो कि नितिन गडकरी संघ की इच्छाओं का सम्मान कर रहे हैं लेकिन हकीकत यह है िक झारखण्ड में किसी भी सूरत में कोई सरकार बनवाने के लिए औद्योगिक घराने सक्रिय हैं. इस बार आश्चर्यजनक रूप से रिलायंस समूह का अनिल अंबानी धड़ा भी राज्य में भाजपा की सरकार बनवाने की कोशिशों में लगा हुआ था.

कितने दिन चल पायेगी, यही प्रश्न है मुख्य.

मुंडा जी के सामने, विकट प्रश्न है मुख्य.

विकट प्रश्न यह मुख्य, भाजपा सत्ता-लोभी.

काँग्रेस की राह चल रही जोर से वो भी.

कह साधक कवि, यह फ़ंडा चलना कितने दिन?

प्रश्न यही है मुख्य कि मुण्डा है कितने दिन?

हिन्दी-ब्लोग्स पर एक पत्रकार-सेमिनार देखा. मुख्य चिन्ता यही थी कि सब बिकाऊ हैं, पत्रकारिता पूरा व्यापार बन गई है.

“नीलम महाजन सिंह ने कहा कि यह कारपोरेट घरानों द्वारा फैलाया गया एक कुचक्र है जिसमें यह कहा जाता है

कि पत्रकारों के पास पैसा नहीं होना चाहिए और उन्हें त्याग भावना से काम करना चाहिए. नीलम महाजन सिंह का कहना है कि पत्रकारों के पास खूब पैसा होना चाहिए ताकि वे जैसे चाहें वैसे काम कर सकें. अगर ऐसा होता है तो अखबार मालिक भी पत्रकारों के ऊपर मनमानी नहीं कर सकेंगे. नीलम महाजन सिंह ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि पत्रकारिता में लड़कियों की स्थिति आज भी बहुत अच्छी नहीं है. प्रथम प्रवक्ता के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा कि पूरी पत्रकारिता को टीले पर खड़ा नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता भी समाज का हिस्सा होती है इसलिए समाज में जो बुराइयां दिख रही हैं वे पत्रकारिता में भी दिखाई पड़ रही है. श्री राय ने कहा कि आज देश के अखबारों में संपादक प्रतिष्ठान ध्वस्त हो गया है जिसके कारण अखबार मालिक पत्रकारिता को भी निर्देशित करने लगे हैं. अगर संपादक प्रतिष्ठान स्थापित हो जाए तो बहुत हद तक परिस्थितियां बदल जाएंगी.” -  अब कोई पूछे राय साहब से कि सम्पादक क्या सीधे “बहादुर राम” प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे, जो पैसे के महत्व को नकार कर सीधे ’देवता’ बन जायेंगे? बङी बात यह कि,

आज प्रकाशक बन गये, सम्पादक जी देख.

पैसा सिर चढ बोलता, आँख खोलकर देख.

आँख खोलकर देख, भले ही आँख मूँदकर.

पैसा-पैसा गूँज रहा है,      सबके भीतर.

कह साधक कवि, पैसा सब पापों का कारक.

लेखक-सम्पादक बनते हैं आज प्रकाशक.

बिहार चुनावों की चर्चा में ’मोदी-मोदी’ खेल चल रहा है. अयोध्या पर ’फ़ैसला’ और मोदी की तेज धार ’माहौल’ बदल सकती है. नेताओं का भी मानना है कि फैसला आने के बाद माहौल बदल ही जाएगा। चूंकि उस समय बिहार के विधानसभा चुनाव रहेंगे तो सबसे ज्यादा असर उसी पर पड़ेगा इसलिए अब नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार के लिए ले जाने का कोई खास मतलब नहीं है।

गौर से देखो पिट रहे, राजनीति में राम.

हर चुनाव के वक्त क्यों, जग जाते हैं ’राम’?

जग जाते जो ’राम’, भला होता दुनियाँ का.

नित्य हो रहा आज कबाङा इस दुनियाँ का.

कह साधक कवि, भीतर-बाहर गौर से देखो.

राजनीति में राम पिट रहे गौर से देखो.

नासमझी में हो रहा, मोदी नाम का ब्राण्ड .

वरना नीतिश कम कहाँ, हैं बिहार के साँण्ड.

हैं बिहार के साँण्ड, एक मोदी भी पाला.

नरेन्द्र से डरते, सुशील क्या लगता साला?

कह साधक कवि, सब चलता है राजनीति में.

ब्राण्ड बन रहे मोदी, केवल नासमझी में.

अयोध्या

In Uncategorized on September 25, 2010 at 2:20 am

 

टला फ़ैसला फ़िरसे भैंस गई पानी में.

अयोध्या का विवाद है आना-कानी में.

आनाकानी दोनों पक्ष की साफ़ दिख रही.

मूल समस्या, समझ की कमी हमें लग रही.

कह साधक जीने की राह में यह बङी बला.

फ़िरसे भैंस गई पानी में टला फ़ैसला.

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