कहानी- हमसबकी-१
मैं भोपाल में एक परिवारमें मेहमान था.
घरके मालिक बहुत वर्षों से आग्रह करते थे कि भोपाल आओ, और हमारे घर ही रहो.
घरके एक कमरे में एक आदमी को बन्द करके रखा था.
बिटिया मेरे लिये पानी लेकर आई, उसको पूछने पर पता चला कि चाचाजी पागल हैं, कुछ उल्टा-पुल्टा ना करदें, इसलिये बन्द करके रखते हैं.
थोङी देरमें उसका छोटा भाई आया. ज्यादा छोटा नहीं, कालिज में पढता है. बहन भी एक-दो साल ही बङी है.
घर आने के दो ही मिनट में भाई-बहन झगङने लगे, भाई अपनी बहन को मार भी देता है, बहन नाराज होती है, झगङ्ती है. माँ दोनों के मेरे सामने कर देती है, कि मैं उन्हें समझाऊँ. मैंने पाया कि लङका खुद ही इतना समझदार है कि मुझे समझा दे, तो मैं उसे क्या समझाता.
मैंने उससे बातचीत शुरु करने के लिये पूछ लिया कि चाचाजी को क्या हो जाता है?
“ उनका आचरण निश्चित नहीं है. भूख लगने से खाना मांगते हैं…. सब्जी-रोटी खाते-खाते अपने बदन पर मल लेते हैं, कभी फ़ेंक भी देते हैं. शायद चाची ने इनको सही प्यार नहीं दिया… ”- लङके ने बताया.
“ अच्छा, तुम तो अपनी बहन को प्यार करते हो कि नहीं ?”… मैंने पूछा.
“ बहुत प्यार करता हूँ….” उसका उत्तर था.
“ प्यार करते हो तो उसे खुश रखना चाहते हो या नाखुश?”- मेरा अगला प्रश्न था.
“ नाखुश क्यों? मैं तो उसे बहुत खुश रखना चाहता हूँ”. उसका स्पष्ट उत्तर जानकर मैंने हँसकर कहा कि फ़िर उसे मारते क्यों हो?
“ वो तो चलता है प्यारमें…” वह ऐसे बोला जैसे रोज ही बहन को ऐसे ही प्यार करता है.
“ तुम्हारी मार खाकर वह खुश होती है या नाराज होती है?”…. मेरे पूछने पर उसका सही उत्तर मिला- नाराज!
“ चाहते हो उसे खुश रखना, और करते हो रोज नाराज… तो तुम्हारे आचरण को निश्चित समझा जाये या अनिश्चत?”… इस बात पर लङका सोच में पङ गया. उत्तर मिलने की अपेक्षा भी नहीं थी, न मिला.
उत्तर मिला शामको.
शाम उसके पिताजी आफ़िस से लौटे, तो घंटी बजते ही दौङ कर लङके ने दरवाजा खोला.
“ आप मुझे प्यार करते हैं या नहीं?”- लङके ने दरवाजे पर ही पूछ लिया.
पिता हैरान! यह आज क्या हो गया ! फ़िर थोङा संभलकर बोले-“ यह क्या सवाल है?…. …. मैं तुमको प्यार करता हूँ, और बहुत प्यार करता हूँ.”
“तो मुझे खुश रखना चाहते हैं या नाराज?”
“खुश ही रखना चाहता हूँ….अब अन्दर तो आने दो.”- पिता की हैरानी बढ गई. बेटे के प्रश्न अभी बाकी हैं.
“तो फ़िर रोज मुझे आपसे डाँट क्यों सुननी पङती है?”
“ वह तो प्यार में…” पिता ने सहज होने की कोशिश की.
“मैं आपकी डाँट खाकर खुश होऊँ तो ठीक रहेगा?”
अब पिता फ़ंस गये.
“खुश तो कैसे होओगे, नाराज ही होते हो…”
“आप मुझे खुश करना चाहते हैं, और रोज नाराज कर देते हैं, तो आपका आचरण निश्चित हुआ या अनिश्चित?”- बेटे ने निष्कर्ष पर पहुँचा दिया.
इससे आगे बेटे को बोलने का मौका पिता ने नहीं दिया. खुद ही बोल पङे- “इसका मतलब कि मैं पागल हूँ….?”
“ आप खुद ही सोच लीजिये पापा!”- बोलकर बेटा चलता बना.
आधा घंटा बाद वे सज्जन मुझसे पूछ रहे थे कि मैं वापस कब जा रहा हूँ.
भोपाल का यह परिवार बहुत सफ़ल माना जाता है. समाज में इनकी इज्जत है, इनको समझदार माना जाता है. बिल्कुल वैसे ही जैसे आपके या किसी भी सामान्य परिवार को माना जाता है.
प्रस्तोता – साधक उम्मेदसिंह बैद

